Thursday, April 21, 2011

एक राही


एक राही 

एक रास्ता एक मंजिल जो  जाने कहाँ खो सी गयी है 
एक राही दो  कदम  जाने  कहाँ थक  से  गये  है 
फिर  भी  एक  उम्मीद  है कुछ पाने की 
उगते सूरज से एक किरण चुराने की 
एक उम्मीद सब कुछ खो कर सब फिर से हासिल कर जाने की ..
राहे जुदा है मंजिल खफा है फिर भी .
अपना एक नया काफिला बनाने की .
दुनिया की होड़ से कुछ आगे निकल जाने की 
एक उम्मीद,एक आशा,एक नया सवेरा लाने की ..
जिंदगी को नयी सुबह दिखने की .
पर अब वो राही, उसके कदम थक से गए है 
आशाओं के बोझ के तले दब से गए है 
उसकी आशा,दीये की लौ सी डगमगा रही है .
कब झोके से बुझ जाये इसका भी पता नही है ..
लोग जाने क्यों समझते नही हालात को .
उस राही,उसकी मंजिल, उसके जज्बात को.....

3 comments:

  1. Then Best of luck from ma side.
    badiya likha.
    background color ya phir font color change kar de, padhne me dikkat ho rahi hai.

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