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Wednesday, May 11, 2011

मै..


मै..

रास्तों में खड़ी होके मंजिलें ढूंढ़ रही हूँ मै,
आँखों में सपनो का सैलाब लिए घूम रही हूँ मै,
सोचती हूँ कुछ तो ख़ास होगा कही मेरे लिए,
बस इन्ही कुछ सवालोँ में खुद को खोज रही हूँ मै,
अज कल वक़्त से ही क्यों हर वक़्त शिकायत है मुझे,
पागलो की तरह क्यों उस खुदा को कोस रही हं मै,
जाने क्यों खुद मे ही बार बार गलत होके भी,
फिर से सही होने की आस लगी है मुझे,
और फिर से बार बार गलत होने के एहसास को धो रही हूँ मै,
क्यों है मेरी ये जंग खुद मुझ से ही,
हर सपना क्यों घूम है मेरा इस भीड़ मे,
क्यूँ उन खो चुके सपनो को आगाज़ दे रही हूँ मै,
रास्तों में खड़ी होके मंजिलें ढूंढ़ रही हूँ मै....!!!!!!



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