Wednesday, May 18, 2011

एक ख़याल...


एक ख़याल...


एक ख्याल बड़े दिनों से मेरे मन को सताता है,
रह रह के बार बार कुछ याद दिलाता है,
मेरे मन के हजारों तार छेड़ जाता है,
जिससे अपना अक्स मुझे आईने में नजर आता है,
ख्याल कुछ ऐसा है-
"की जिंदगी अगर ऐसी चली होती तो कुछ और हो भी सकती थी"
"क्या मेरे सपनो के राह आसान हो भी सकती थी??"
बहुत सोचने पर मेरा दिल ख्यालो से ऊपर उठता है,
जवाब देता है-अगर जिंदगी का रुख इस ओर ना होता तो,
तो इस जिंदगी के माएने थोड़े कम हो जाते,
ओर हम बिना इन कीमती दोस्तों के मायूस रह जाते,
आखिर सपनो को उड़ान ना भी मिली तो क्या हुआ..
अपनों के मायने जिन्दगी में कैसे समझ पाते,
बस मेरा ख्याल वही चुप हो जाता है,
अंधेरो की गेरैयों में फिर कही ग़ुम हो जाता है,
ओर फिर नयी तहरीरे जुटाने में लग जाता है,
बस एक ख्याल.......








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