Friday, June 3, 2011

दोराहा..



दोराहा..

ज़िन्दगी के अजीब दोराहे पर आके कड़ी हूँ मै,
किधर जाऊं इस सोच में पड़ी हूँ मै,
मन कहता है,मेरी राह पे जा,
दिल कहता है मेरी पे चल के तो दिखा,
और दिमाग कहता है,अपनी नयी दिशा बना,
सोचने पे मजबूर हूँ मै की, दोराहे से,
एक नया रास्ता कैसे निकल आया,
मेरा दिमाग भी अपनी नयी धुन है लाया,
सपने देखे है मैंने कई,
पर शायद उनकी राह आसान नहीं,
बस इन सब उथल पुथल के बीच निशब्द सी,
अचेत सी,कुछ शांत सी,अकेली खड़ी हूँ मै,
एक घना अँधेरा चारो तरह फैला है,
और मुझे भी अजीब सा डर लग रहा है,
इस अँधेरे में दिशाहीन मै कही खो जाऊं,
आशाओं के बोझ तले कही बिखर ना जाऊं,
अन्दर एक तूफ़ान है,तो बहार भी सुनसान है,
आपको क्या बताऊं की खुद से ही,
अन्दर कितना लड़ रही हू मै,और,
आज फिर एक दोराहे पर आकर खड़ी हूँ मै.......!!


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