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Wednesday, July 6, 2011

देखा है मैंने


देखा है मैंने
देखा है मैंने,
अरमानो को जलते हुए,सपनो को पिघलते हुए,
इन रातों को सिसकते हुए,उन परछाइयों से डरते हुए,
देखा है मैंने,
भीड़ में सबके खो जाने का डर,
पतंगे से लौ के बुझ जाने का डर,
काँच के अकस्मात् टूट के बिखर जाने का डर,
पत्तों में तेज हवा से टूट के उड़ जाने का डर,
पंछी का अपना आशियाँ टूट जाने डर,
देखा है मैंने,
आज कुछ ऐसा ही डर सता रहा है मुझे,
मेरा आशियाना ही छोड़ कर जा रहा है मुझे,
अँधेरी परछाइयां जाने क्यूँ  डरा रही है मुझे,
मेरे इस होसले के टूट जाने का डर,
देखा है मैंने...!!!




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