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Wednesday, January 11, 2012

साथ



साथ


जब जब मैंने साथ था चाहा,
तब तुम मेरे साथ नहीं थे,
आँखों से आंसूं थे बहते,
पर हाथों में हाथ नही थे,
जब चुप रह के समझाना चाहा,
तब होटों पर अलफ़ाज़ नहीं थे,
मैंने हाथ पकड़ना चाहा,
पर तुम मेरे पास नही थे,
सपनो की एक भीड़ थी भरी,
मैंने सोचा तुम तो समझोगे,
पर तुमको विश्वास नही था,
मेरे सपनो की चादर से,
तुमको कोई सरोकार नहीं था,
तब भी तुम कुछ दूर खड़े थे,
आज दूरियां और बढ़ गयीं,
तब तुम कहते पास नही हूँ,
तुमने जब न समझा मुझको,
मै कैसे समझूंगी तुमको,
मै तो अब ही दूर हुई हूँ,
पर तुम पहले से दूर खड़े थे,
तुम ही थे मुझको यहाँ पहुचाने वाले,
अब ये दूरी कम न होगी,
मै जहाँ खड़ी हूँ वहीँ रहूंगी. 
काश! तुम मुझको जो समझ ही पाते,
आज मुझको अपने पास ही पाते..!!




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