Tuesday, February 25, 2014

रेत



रेत सा फिसला है आज वक्त ऐसे,
थम गए हो सारे यूही लम्हात जैसे,
जज्बात के फ़ीके पड़े है रंग सारे,
जहन मे टूटे पड़े हो ख्वाब जैसे,
परछाइयां यूँ रूठकर जाने लगी है,
मेरे चाँद को लग गया ये ग्रहण कैसे,
आज सवालों की लग गयी है झडी दिल मे,
क्यूँ जवाबों मे उलझे है ये सावल ऐसे,
रात ने खामोसी की मोहर यू लगायी,
की टूट कर बिखर गए मेरे अल्फाज़ ऐसे …!!

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