Sunday, April 6, 2014

अलक से फ़लक तक

अलक से फ़लक तक बस यूं ही चलते रहे,
तेरा हाथ थामे हुए बस बढ़ते गये,
वो तुझ पर भरोसा ही था जो पूछा नहीं कुछ,
तेरे कदमो के साथ कदम बढ़ते गये,
राह मे एक वक़्त जब हाथ छूटा,
तब हमने पीछे मुड के जो देखा,
ना तुम दिखे ना वो तुम्हारा हाथ था,
ना वो कदम थे ना वो तुम्हारा साथ था,
ठिठक गये हम ये सोचकर की कितनी दूर गये हैं,
अब ना तो मंज़िल पता था ना ठिकाना रहा था,
अपनी गलतियों पे बस यूँही पछताना बचा था,
काश ना वो हाथ थामते ना वो साथ मांगते,
अब तो ये हाथ खुदा से बस ये दुआ मांगते,
ना ऐसा कोई हाथ देना ना ऐसा कोई साथ देना,
जो अकेला छोड़ दे ना ऐसा कोई रेहमतगार देना,
अब जरूरत हो कभी भी एक साथ की तो,
बस एक तू ही एक मेरा हाथ थाम लेना ….!!