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Saturday, October 11, 2014

जिक्र

यूं कुछ तेरा जिक्र ही ऐसा हुआ जो,
की यादों मे कुछ पल ताज़ा होने लगे यू,
कुछ साँवली सी झलकियां आँखों से गुजरने लगी,
कुछ देर के लिये मस्तिष्क़ पे सोच का बादल गहराने लगे,
सोच की नदियाँ मीलों दूर तक बहने लगी,
कुछ मीठी बातें परचम बनकर लेहराने लगी,
आँखों से समंदर बाँध तोड़ क़र बेहने लगा यूं,
आज पूरा चाँद भी अधूरा लगने लगा यूं,
कुछ तेरा जिक्र ही ऐसा हुआ जो …..!!



सुचिता

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